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🌳 संस्कृति रहय गाछ !
कथा-पिहानी पर्यन्त बदलि लेलक अपन स्वभाव
यैह जे पहिने स्नेह प्रेम मे मृदुल समर्पित त्याग रहैत छलय आब तकरा जगह घृणा,क्रोध प्रतिशोधक उग्र
स्वार्थक कथा बनि गेलय।
कियेक चित्त बेचैन,एना सबकिछु अनठीया-अनगौआं सन बुझा रहलए।
सुन्दर सफ़र करैत जीवनक की खसि पड़ल कत’ बाट मे, बुझि ने सकलौं। बुझलौं जखनो तखन तं जइतौं पाछां,जा क’ तकितौं। भेटि गेल रहितय अवश्य। पाछां अबैत मोसाफिर,कोनो गाछ तर बितबैत रौद ख़ुशी सं आगां ध’ दितय। कहितय-’जइ इनार सं अहाँ पीने रही पानि,ओत्तहि खसल छल,भैयारी ! अहाँक ई वस्तु अपन ल’ लिअ।’
से छूटल-हेरा गेल यदि कार्यक हो तं तखनहि ताकुत रखबाक चाही,ताकि लेब आवश्यक।
बूढ़ वस्तु सभटा व्यर्थे नहि,कार्यक सेहो रहिते अछि।
टूटल कमानी वला छत्ता बचबैए रौदक धाह सं।
बाट मे आब कम्मे भेटैये ब’र-पाकड़िक छाहरि दैत विशाल गाछ !
यैह टुटलो कमानीक छत्ता प्रचण्ड रौद सं रक्षा करैत पहुँचबैये आगां कोनो गाछक छाहरि धरि !
न’व छाता किनबा धरि।
जीवन पथ,मनुक्ख आ छाहरिक
संस्कृति रहय गाछ !
गाछहि त’र मे अनंत विषय छल, लोकक बात-विचार,
क्लांत-देह हाफी पर हाफी छोड़ैत जन-बनिहार,
सोझाँक समस्त दु:ख तकलीफ आ समस्या कें ललकारा में गबैत अल्हा-रूदलक नगाड़ा जकाँ गरजैत ढोलक रहय, प्रेमोजस्वी कविताक गान रहय ।
ऊपर कतोक पंछीक चिन-चुन करैत बसेरा!
कोनो कात छाहरि में बीत भरि जीह निकालैत हकमैत सुस्ताइत कुकुर !
गाम घुरैत मॉर्निंग स्कूलक विद्यार्थी,
बड़ा पोस्टाफिस सं पहिल नोकरीक रजिस्ट्री चिट्ठी छोड़ा क’ आबि रहल सङ्गी रमानंद !
हाफसटक बांहि सं कपार परक घाम पोछैत !
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गंगेश गुंजन
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