।आलोचनाक मैथिली-संसार।
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आलोचनाक संसार मे कि तं साहसक अभाव देखायत वा दुस्साहस।जखन कि आलोचना सन निरपेक्ष,विवेकी रचनात्मक लेखन-कार्य लेल अपेक्षित मौलिक तागति,सासह थीक। सैह चाही। ई कोनो अंतिम सिद्धांत नहिंयों हो, मुदा विद्यमान वास्तविकताकें देखैत यैह लगैए।
आलोचक वास्ते आलोच्य कृति सहित स्वार्जित अपना ज्ञानक प्रयोग करबाक साहस वांछित छैक। साहस कोनो ने कोनो सामाजिक नैतिकतेक मानवीय गुण थिक।
ई हमरा बुझाइत अछि।
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-गंगेश गुंजन।६.५.’१९
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