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आबा बाटे आयल कविता
आइ फेर कवि
बेमोने कविता लीख' लगलाह।
किछु तँ चाके पर गढ़ाइते
कालक घैल जकाँ टेढ़-टूढ़ भ'
गेलनि। किछु चाक सँ उतरि
माटि पर रखबा काल भसरि
गेलनि
आ किछु सुखयबा काल रौद मे
चनकि-चुनकि गेलनि
आवा मे देबा योग्ये नहिं
बनलनि।
नजरिक भ्रम मे जे घैल आवा मे
चलियो गेलनि से पाकियो क'
सुन्दर साबुत
नहिं निकललनि। से
किछु,निकहे
बर्तन सभक बीच एक कात मे
बेछप पड़ल रहलनि अनमन
ओहिना जेना
जरूरी सुन्दर कविता सभक
संग्रह मे कोनो अधलाह बौक
बहिर कविता बहुत दिन तक रहि
जाइए कोनो नीको किताब मे।
बाल पाठ पोथी सँ ल' उच्च पाठ्य
पोथी सभ मे पढ़ाओल जाइत रहि
जाइए।
सब कविता आवा बाटे नहिं
आयल रहैए
यद्यपि बहुत काल तक कविते
कहल-कहबाओल चलि जाइत
रहैए।
शरीर-मन असोथकित हो वा
दुखित तँ कुम्हार कें छुट्टी ल'
लेबाक चाही।
सानल माटि,चाक,डंटा ल'ग
नहिं बइसक चाही।
गंगेश गुंजन,
२५.०२.'२२.
#उचितवक्ताडेस्क।
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