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राजनीति अछि झिक्का तोड़ी
ओकरा पकड़ी एकरा छोड़ी।
शहरी ग़पशप ड्राइंग रूमक
झूठ सत्य के नुक्का चोरी।
गामक लोकक कठ विवाद सं
भोटक दरबज्जा बलजोरी।
लोकतंत्र भेल नव दियादी।
एकहु इंच भूमि नहिं छोड़ी।
रंगमंच पर रूसा फुल्ली
पर्दा मे बड़का भैयारी।
घोंखथि सब विचार जनतंत्रक
राजतंत्र सन बजड़ा-बजड़ी।
सभक हाथ कागज कानूनी
न्यायक रस्ता दस्तावेज़ी।
सिद्धान्ते लाठी छनि हिन कर बजड़ल बीच सभा मथफोड़ी।
लोक बुद्धि सांँझक यथार्थ मे
नागर बुद्धिक अफरा तफरी।
जन्मैए जरूर एखनो शिशु । मरिओ जाइछ नवका सोइरी।
कृषकक पसरल क्लेश देखि क'
होइए अपने मुड़ी मचोड़ी।
* गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क
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