किछु मन पसिन्न दूपँतिया

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  हम नहिं कहलौं स'ब नऽव पहिने हम्हीं
कहलौं   
  जे हम कहलौं नऽवे कहलौं,हम से
कहलौंहें।
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  होइतहिं रहल हमर भरि जिनगी
अगिलग्गी
  आंँखिक पोखरि सुखागेल सब
मिझबै-ए मे।
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  मरणक मूल्य रहैत तंँ ओकरो
बहुत दोकान वोभेटैत
  जीवन रहितय लऽग एखन जे
हाथसँ बाहर अछि।
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  रूसि गेली कमला घुरि कऽ नहिं
अयली फेर ई गाम
  तें की अद्यपि हृदय -धार केर
मिथिला प्रीति बहैए।
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  धयल रहय तंँ छुच्छ कोनो एक
वस्तुअछि- कलम
  चलऽ लागय तँ 'माँ','गोदान' आ
'चित्रा' अछि।
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  हाथक चिनगी पझा रहलअछि,
दुःख होइए
  कलमो जेंँअलसा रहलय हम तेंँ
उदास छी।
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                गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

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