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काज करी तँ एहन जेना कि
कलमक नीब करैए
मोसिक ऋण ल' क' दुआति संँ
अक्षर सब बिलहैए।
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किछु ने किछु होइत रहय,किछु ने
किछु करैत रही।
अपनो लय जरूरे आ लोको हित
चलैत रही।
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अनेरे डगडगा गेल आंँखि
कुटकुटाय लागल
धूआँ किएक भऽ जाइए ककरो
नामकचर्चा।
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स्नेह मे सब टा सुन्दरे सुन्दर नहि
होइ छैक
देखि-देखिक' अपने जे होइत रहै
छी मुग्ध।
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चिकड़ि क’ हारि गेलौं बजा-बजा
कोय ने आयल
'कोना छी गुंजन जी' पूछ' सब
अस्पताल आयल।
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एना देखिक' एकसर हमरा बूझब
नै एकसर
सौंसे गामचलैए संगे हमर
छोटछिन म'न मे।
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सुखायल पात जकाँ उड़ि गेल
रहितहुंँ बिहाड़ि मे
घेरि क दु:ख सब पाथर बना,हमरा
बचा लेलक।
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सब दिन अपना मनोरथे पर चढ़ि
कऽ हम चललौं
घोड़ा गाड़ी मोटर धरि कहियो
सोहाएल नहिं ।
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कलम मे दोस्त कें कहैत रहै हमरा
द' छौंड़ा
'कते फरैत रहै पहिले ई बम्बइआ
गाछ'
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#उचितवक्ताडेस्क।
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