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अहँक सब किछु एम्हर ओम्हर अछि
नै जानि ध्यानो कत' कोम्हर अछि।
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एहनो समयक विकाल काल मे
आनक चिन्ता की अछि अगर अछि।
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महानगर तँ स्वर्ग बनौलौं
बाँकी पसरल नर्क सगर अछि।
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जाड़े जठ्ठर काल खेपैए
गरीब-गुरबा सब बे घर अछि।
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अपन व्यवस्थाक गुण गबैत छी
तै मे गामोक लोक मगर अछि।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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