🌗
ओ एकसर अछि ओहो एकसर
सब एकसर अछि हमहूँ एकसर।
प्रकृति वनस्पतियो नहिं दोसकर
गाछ पात बाटो अछि एकसर
धरती एकसर मेघो एकसर
रौद बसात सब किछु एकसर।
भने भेल जौंआंँ गाछो ओ
कतहु ठाढ़ अछि लेकिन एकसर।
गीत नाद सब हंँस्सी ठठ्ठाक
शुभ अवसर सेहो अछि एकसर।
नव कनियांँ एकान्त कोबर मे
व'र दलान ड्राइंग रुम एकसर।
जतवा जे कहि रहलौंहें ई
भरि जीवनक बोध अछि एकसर।
संसारक ई सार बुझी तँ
दोसकर क्यो नहिं सब अछि
एकसर।
गाछ त'र जे राति बिताबथि
कतो लोक सन ओहो एकसर।
ई संसार रचल जहि सृष्टिक
ओहो खुद अपने अछि एकसर।
लेकिन
कापी कलम दुआतिक
शब्दकोष पोथी नहिं एकसर।
🌼
#उचितवक्ताडेस्क। गंगेश गुंजन २५जनवरी,'२३
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें