🌼 समावेशी आलोचना 🌼
ई नहि बुझै जाइ जे समावेशी
आलोचना मात्र अपन मैथिलीए टा
मे भेटत। नहिं। सम्भवतः अन्यान्य
अनेक भारतीय भाषा साहित्यक
प्रिय विधा छैक।
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#उचितवक्ताडेस्क। गंगेश गुंजन २फरवरी,२०२३.
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