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भरि दुनिया सरकारी अछि
कागज़ फूलक क्यारी अछि।
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बात विभेदक करब न हम
मेधा मुदा बिहारी अछि।
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सऽब सफ़र लय जीवन मे
विद्या मात्र सवारी अछि।
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आब एखन अछि वैह धनिक
जकर पुत्र व्यौपारी अछि।
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हयत कोनो सुन्दर बस्ती
भागलपुरक बरारी अछि।
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उसरल गाम पड़ायल शहर
टूटल घऽर घरारी अछि।
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सत पूछी तँ भरि दुनिया
भिखमंगे कि जुआरी अछि।
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गीत नाद संन्यासी भेल
भरि समाज महकारी अछि।
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ई कविता आजुक श्रम केर
गुंजन जीक दिहाड़ी अछि।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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