ग़ज़लसन : कत' कहाँ संँ हम बौआ ढहना एलौं

                ग़ज़ल सन 

कत' कहाँ सँ हम बउआ-ढहना एलौं       एक बेर तँ जीवन मे संगमो नहा एलौं।

बहुत रास निर्माल जमा भ' गेल छलय    साँझे  खन गेलहुँ गंगा में दहा एलौं।

बहुते दिन पर भेटल ख़ूब खुशी छल ओक हलक सब एकान्त फेर सँ सजा एलौं।

अफसोचे क' क' की भ' जायत आब    पोथी-पत्रा, सोना-जीवन गमा एलौं।

बीच दुपहरिया भेटल छल गामक मितवा कहलक सब दु:खान्त धार मे भंँसा एलौं।

विप्लव विद्रोहक युग भरि सक्के रहि गेल  सड़ल राजनीति यमुना मे जा दहा अयलौं। 

एहनो काल समाज मे एखने हँसैत रही केहन करुण दुर्घटना द' कहि कना देलौं।

बड़ अभिमान रहनि गुंजन जी के दोस्तीक    विश्व बज़ारक-युग हे, सद्य: ढहा देलौं।

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                    गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।                                  रचना: २८.०३.'२३.

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