📔 'तटस्थता'क अवधारणा'
आब हमरा इहो लगैए जे मौजूद युग- चेतना,सामाजिक कर्म ओ विचार मे 'तटस्थता'क अवधारणा कें नव तरहें परिभाषित करबाक चाही।
आइ एहि युग,काल मे जखन कविता ओ पत्रकारिते नहिं,न्याय व्यवस्था पर्यंतमे 'पक्ष' ओ 'विपक्ष' रहब मनुष्यक अपरिहार्य नियति भ' गेल छैक आ जनपक्षधरता कें निरीह बना,धकिया क' एक कात मे क' देल गेल छैक तखन 'तटस्थता' शब्द नव बुद्धिजीवी क्रीड़ाक गोटी मात्र भ' गेलय, आर किछु नहिं।इतिहास स्वयं अपने अनिश्चय आ दुविधाग्रस्त दिक्भ्रमित भेल अछि। एकरा अपने ठकमूड़ी लागल छैक।
सामान्य लोक-बुद्धि फराके असमंजस आ संदेहमे चकभाउर द' रहल अछि। एहना परिस्थिति मे इतिहास कोन जन साधारण
लोकक केहन तटस्थताक,की 'अपराध' लीखत ?
।|🌀|। गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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