अप्रिय किन्तु तथापि…
साहित्य कर्म,रचनाकार ओ स्रैष्टिक मानवीय सरोकार पर विश्वबोधक मौलिक चर्चा तँ मैथिली मे एखन प्रारम्भे नहिं भेल अछि। से होएबोक सम्भावना सम्प्रति कम देखाइ पड़ैए। यद्यपि ताही भ्रम मे जे किछु कतिपय प्रबुद्ध नवलेखक विचारक सब लीखा-पढ़ी क' रहल छथि आ उपस्थित अछि,से मानब नितान्त वैयक्तिक भेल। ताहि मे बेसी सँ बेसी एक रेखीय वर्तमानताक चिन्ता ओ भविष्यक सीमित दृष्टिबोध प्रतिभासित होइति अछि। प्रायश: आत्मपरक तथा पूर्वग्रही।
यत्किंचित जे छैक से सर्वथा मौलिक नहिं, मैथिलीतर भाषा सभक प्रभावक छाया मे। ई हमर स्थापना नहिं,अनुभवक कथन मात्र थीक।एकर सीमा भ' सकैए।
गनल गुथल कतिपय मैथिल सद्य: प्रौढ़ मैथिली विद्वान संयोग सँ ताहि मौलिक काज मे यशपूर्वक क्रियाशील सेहो अवश्य छथि आ ताहि पर मैथिली कें अभिमान सेहो छैक परन्तु विडम्बने कही जे से देशक विभिन्न विश्वविद्यालयक हिन्दी-प्राध्यापकी मे।
मैथिली मे,मैथिल द्वारा,मैथिली लय चाही ।
आधुनिक मैथिली कें मूल मैथिलीमे-
आधुनिकतम 'विचारक' चाही। विचारक।
इतिहास आ दर्शन शास्त्र इत्यादिए जकाँ विचार सेहो स्वाधीन विधा,विद्या थीक। साहित्य सन उत्तरदायित्व पूर्ण कार्य विचार,पार्ट टाईम लेखन कथमपि नहिं भ' सकैए। एखन तँ साहित्य में कतेक गोटय जनिका धरियो पहिरबाक अवगति नहिं सेहो साहित्य पर अधिकार पूर्वक टिप्पणी करैत धन्य क' भ' रहल छथि कि तँ मातृभाषाक सेवा क' रहल छी।
प्रौढ़ सँ प्रौढ़ साहित्य जन्य मैथिल उद्गार कें पढ़ैत काल लगैत रहैये जेना कोनो नव सिखुआ किशोर भागलपुरक तिलका मांँझी खंजरपुर-रायबहादुर सुखराज राय रोडक ढलकान पर हाफ़ पाइडिल साइकिल चलबैत कृत-कृत भ' रहल हो।
एहन अभाव पर हमर ऐ अनुभव कें कोनो विचारकक निष्कर्ष नहिं,मात्र एक टा रचनाकार / लेखककेर चिन्ता एवं भाषाभिमानक कुंठा मात्र बूझल जाय, कृपया।
*
औ महानुभाव लोकनि,
एकान्त मे आब प्रेम तंँ सम्भवे नहि रहलै तँ मिथिला,विशाल समाज,संस्कृति आ सदाचार कें अपन भूगोलक बन्हेज मे राखि क' बचाओल हयत? आ भाषा !
एक बेर फेर हमर सविनय निवेदन:
१.
हिन्दी सँ तीव्र स्पर्धा राखै जाइ। विरक्ति वा घृणा नहिं।
२.
"कि तंँ मैथिली,नहिं तँ अंग्रेजी" वला घातक, दास मनोवृत्ति सँ हमरा लोकनि आबहु मुक्त होइ जाइ से अनिवार्य।
*
किन्तु
निठ्ठाहे सैह परिस्थिति नहिं अछि तें चिन्ताक अवश्य परन्तु हताशाक बिल्कुल नहिं। कारण जे नव खाढ़ीक किछु रचनाकार मे एतद्विषयक चिन्ता,कार्य कलाप आ रचनात्मक क्रियाशीलता सेहो अवश्ये लक्षित कयल जा सकैए। मैथिली भाषा साहित्यक भविष्य-रचना,निर्धारण मे अपन भूमिका अवश्य निबाहतीह / निबाहताह। कतोक अन्य भाषा साहित्यानुरागी जकाँ हमरो एकर दृढ़ भरोस अछि। शुभेच्छा।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें