🏘️• कोन्टा लै छथि कवि !
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देखी तंँ कविक काज ककरो चतुर्थी रातिक कोन्टा लेब सेहो भ’ सकैए।परन्तु आब ने ओ बियाह रहल ने ओ जिंजिर-किल्ली वला कोबरा घरे।भाउज आ सखी -बहिनपा सेहो कहाँ रहली।ने ओ दाइ- माइ सब जे मुंँह झाँपि क’ बेटी पुतहु केँ ओ सब बन्द करैक शासन करैत छलथिन कि परोक्ष सहयोग !
एकसर सियाराम ‘सरस’ कि गीतकार चन्द्रमणि प्राण अरोपि हज़ार गीत लीखियो क’ मैथिली जनजीवन मे ओइ संवेदना-संसार केँ फेर आपस आनि सकथि तंँ अवश्य करथु प्रयास।
सम्प्रति विवाहो राजनीति जकाँ होइत अछि आ वार्षिक प्रतिवेदन जकाँ विध-वेबहार।
कोहबरक कोन्टा लेब कविताक पूर्णकालिक प्रयोजन नहिं भ’ सकैए।
प्रेम आ व्यापक सामाजिक सौहार्द्र लय गोपीचंद के पुरने- धुरने सारँगी चाही। गुदड़ी सँ झाँपल गात ! वैह उदास विकल करैत चल जाइत भास !
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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