• (आशामे एकटा अधसिज्झू कविता)
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गाछीक सौन्दर्य !
मनुष्य आमक गाछ रोपलक।
मनुष्य लिच्ची गाछ रोपलक।
भरि देशक विविध स्वाद,प्रजाति तकलक आ एकट्ठा गाछी-महागाछी बनबैत चलि गेल।
बताह भ’ क’ फड़लै तँ आब तकर रक्षा मे रखवार-ओगरवाह राख’ लागल।
एक तँ मज्जरे होइत देरी,तकर बाद टिकुलाक ! डम्हक होइत- होइत कतहु सुगन्धि गाछी मे घेरायल बान्ह कि ओगरवाह वा मालिकक अधीन रहि सकैए ?
स्वाधीन अछि गंध।
प्राण धरि पसरैत सुगंधि घेरा-बेरा तोड़ि चुप्पे चापे मेघ सँ दोस्ती करैए,
मृदुल बसात पर आरामकुर्सी लगा क’ बैसैए। अबैए बाल-किशोरक नाक मे पैसि क’ भरि टोल नोत द’ जाइ-ए ।
कछमछाय लगैत छैक-सरिया क’ राखल अपन अपन गुलेल,अपन अपन ढेपक झोरी।
बड़ी जोर सँ दुपहरिया अबैत छैक…
बसातक सिहकी मे ओंघा क’ कोनो गाछ मे ओठङ्गल ओगरवाह के झुकैत रहब सुन्दर लगै छैक। ओकरा एक रती ओंघी लगबे मे छैक आम संँ लुधकल गाछीक सुन्दरताइ।
सड़क सँ उतरि क’ गाछीक भीतर आबि क’ ठाढ़ भेल- मधबनी-पटना,कलकतिया पैकारक ट्रक मे
कथमपि नहिं।
आम-लिच्ची गाछीक सौन्दर्य
ओगरवाह मे नहिं,
ताक मे धपाएल बैसल बाल-किशोर टोली मे छैक।
💦
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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