आशाक आसव
आशा आशा झकाँ रहय तखन तँ बड़ दिव।किन्तु किछु गोटय कोनो आशा कें आसव बना लैत छथि। बहुत लोक भाँङ्ग। एक टा आशा टूटल तँ दोसर पी क’ धुत्त भ’ गेलौं।
कोनहुँ आशा अनन्त काल तक नहिं कयल जा सकैए। कामना बूढ़ तँ नै होइत छैक। किन्तु बूढ़ मोनकामना मेहायल- सेरायल भँटवर-सजवर जकाँ भ’ जाइत छैक।
। ❄️ । गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें