भाषा आ मैथिलीक साहित्य-समय

 📓    भाषा आ मैथिलीक साहित्य-समय 

कोनो भाषाक साहित्य ओकर समस्त जातिस्थानीय संस्कृतिक कोश जकाँ होइत छैक। अन्य भाषा-संस्कृति समाजक लोक ओकरा बुझै लय,ओहि भाषाक साहित्य कें कुंजी जकाँ पढ़ैए।

  सम्प्रति मैथिली साहित्य मे विश्व- समाजक दु:ख द्वन्द्व आ तकर चिन्ता 

हमरा विस्मयकारी रूप में असह्य सीमा धरि उपस्थित नहिं लगैए। 

   मैथिली,मिथिला ओ तकर उत्थान हमरा सभक प्राथमिकता अबस्से होयबाक चाही आ से अछियो।किन्तु एकटा साहित्यकारक भूमिका एतबे मे सीमित नहिं होइत अछि। हमरा नै ज्ञात जे एखन जे साम्प्रत्तिक साहित्य भरि संसारक अनेक विशिष्ट भाषा मे की- किछु लीखल-पढ़ल जा रहल अछि ।तकरो अनुवाद भ’ रहल अछि कि नहिं।

एम्हर इहो चिन्ताक अनुभव भ’ रहल अछि जे मैथिली साहित्यहु मे उल्लेखनीय बनय लय आब किछु प्रतिभावान लेखक भाषा प्रान्तक राजनीतिक एक्टीविस्ट भ’ रहल छथि। साहित्य मे ई शॉर्टकट नव रुझान जकांँ परिलक्षित भ’ रहलय।

 एहन हार्डवेयर मैथिली राजनीतिक रूप मे सर्जनात्मक लेखकक एक्टिविज़्म

संदिग्ध भ’ जाइत छैक। वर्तमान भने ओइ लेखक विशेषक लल्लो-चप्पो मे लागल रहनु किन्तु ओकर भावी महत्व क्षीणे रहैत छैक। कारण जे ओइ समाज मे संघर्ष सँ आयल वांँछित परिवर्तनक व्यवस्था अबैत देरी सक्रिय छुच्छ हार्डवेयर राजनेता ओकरा हड़पि लैत छैक। लेखक कें बेदखल क’ दै छैक। कही जे कोनो प्रलोभनक मुँह बाटे सोझे गीड़ि लैत छैक।

   एक मात्र यात्री जी आ रेणु जी कें जेपी आन्दोलन समेत एहन कोनो आन्दोलन नहिं गीड़ि सकलनि। हमर एहि अनुभवक स्रोत सेहो छथि-महाकवि यात्री आ रेणुएंँ। 

    सम्प्रति मैथिली साहित्य मे भारतीय भाषाक सभक साहित्य,विश्व समाजक मानवीय सामाजिक दु:ख द्वन्द्व आ तकर चिन्ता विस्मयकारी रूप में असह्य सीमा धरि अनुपस्थित लगैए।किन्तु हम पढ़बाक अपन सीमा मे ई कहि रहल छी। 

  जँ भ’रहल होइ ई तँ हमर विनम्र जिज्ञासा जे अवगत कराबी। उपकृत करी।                 📓

                   गंगेश गुंजन                                     #उचितवक्ताडेस्क।

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