📕 आत्मालोचनक सङ्गहिं
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आत्मालोचनक सङ्गहिं पुरना खाढ़ीक वर्तमान विद्यमान लेखक केँ जे रचना विरत नहिं भ’ चुकल छी,अपन कविताक समीक्षा अहूँक प्रिय दुरुस्त बोधक नवका खाढ़ीक संवेदनशील प्रतिक्रिया मे सेहो पढ़बेक चाही।तकरो अपन रचनाक आलोचना बुझबाक चाही। हमर मानब अछि जे ई बोध कोनो रचनाक जीवन्तताक बड़ ठोस कसवट्टी होइछ।
यदि समकालीन नव बुद्धि-वेदना अहँक लीखल अनवरत ख़ारिज करैत बुझाय लागय तँ पुरान लेखक केँ रुकि जयबाक चाही। लिखबाक कोनो आन उपयुक्त विकल्प ताकि लेबाक चाही।
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हम रहि गेलौं गामे गबैत श’हर मे बैसल ख़ुद गाम जानि ने कखन पटना नगर भ’ गेल।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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