🙏। कहल सुनल माफ़ बन्धु !
श्रेष्ठ संस्कृति सेहो डीही होइत अछि। बाहर जाइत लोक सब संगे डीह नहिं,नगर महानगर सब मे जा क’ बसि गेल लोक सङ्गे ओकर पराग जाइत छैक-देस परदेस।
कतिपय प्रवासी बुद्धिजीवी कें ई भ्रम रहैत छनि जे गाम सँ निकलि क’ असाम कामरुकमख्या,दिल्ली कि पंजाब गेलाक बाद गृहस्थीए संगे उठि क हुनकर गामो चलि अयलनि। अओर तंँ अओर,कय टा अन्य विशिष्ट महान तंँ मानि लैत छथि जे जहिये ओ मिथिला छोड़लनि तहिये हुनके संग मिथिला सेहो उठि क’ महानगर चलि आयल। मिथिला मे हुनका बाद मिथिला सेहो नहिं रहल।
आब एहन बौद्धिक विवेक कें की कहल जाय ?
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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