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कविता मनुष्यताक गहनतम व्यथा कें भाषामे ज्वाला बनयबाक गेय उपाय थीक।
एत धरि जे प्रेम !
कविता मे असहाय नेप नहिं चुआओत अपितु करुणाक बिहाड़ि भ’ क’ बहत।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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