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🌸              ° परथन °
    कविताक रोटी
समाजक परथन बिना बेलल नहिं जा सकैए।
सबदिन जकाँ रोटी आइयो पकिते अछि जेना विपत्ति सँ विपत्तिक कालहु मे नित्य जनमिते रहैत अछि मनुष्य।
       होइतहिं रहैत अछि सृष्टि।
चलैत रहैत अछि सामर्थ्यक कोनो ने कोनो सत्ता आ तकर व्यवस्था।

सुख शान्ति संगहि आवश्यके रहैत छैक सब राजा सँ - सब लोकक रोज़ी-रोटीक सुनिश्चित उपाय पयबाक प्रजाकें अपेक्षा आ अधिकार। नइं तँ ढलमला जाइत छैक नीक सँ नीक प्रबन्ध ओ भविष्यक ऊँच सँ ऊँच आश्वासन।
    रहै पड़ैत छैक ओकरा हरदम -ख़बरदार।                        |🌺

                   गंगेश गुंजन                                    #उचितवक्ताडेस्क।

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