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कविता स्वभावे सँ निर्बन्ध होइए-आवारा !
बान्ह-छान कविताकेँ कहियो क़बूल नै भेलै। छन्द-बन्ध-व्याकरण मे तंँ ओ जखन-जखन बन्हायल से अनमन तहिना बुझू जेना माता यशोदाक म’न रखै लय श्रीकृष्ण सहजहिं उक्खरियो मे बन्हा जाइत रहथि। 🌈
गंगेश गुंजन #उवडे.
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