माय-बाप : एक रती भेद !

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          माय बाप : एक रती भेद !
बेटी अबैए तंँ हमहूँ अनमन बच्चे जकाँ दुलारू भ’ जाइ छी।अगड़ा जाइत छी। किनका सोझाँ ? माँ-बाबू तंँ छथि नहिं। तखन अपने सन बूढ़ अपन कनियाँक सोझाँ आ जे बच्चा कहियो हमरा लग दुलार मे अगड़ाइ छल हयत ताही बेटी-बेटा सब लग 😃। दासम दास भेलि ओ सब दुलारू बूढ़ पिताक फरमाइश पूरा करैत रहैए। पिता केँ-आनन्दे आनन्द।
  किन्तु तहिना हमरे जकाँ बेटीक माय अर्थात् सरिता जी बेटी लग दुलारू नहिं भ’ सकैत छथि। हुनको लय बेटी एहिना छनि। आराम आ ख़ुशी दै लय पिता सँ बेसीए तत्पर। तथापि माय बेटिए केँ सोचतीह।
‘अहा,ओत्तऽ अपन सासुरो मे काज करैत रहैत छथि। एत्तहु काजे मे लागि जाइथ से कोन बात! माय लग अयलीहय।माय लग तंँ कनी आराम भेटनि। नैहरो आबि क बेटी काजे करत ! तँ झुठ्ठेक नैहर ?’ आब बुझू जे काज नै कर’ दै लय बेटी सब सँ झगड़ा होइ पर विर्त। बेटियोक तंँ मोन जे ‘हम सब छी तँ माँ दू दिन आराम करय! बेटी सब अछैत वैह काज करय ?माँ के दुइयो दिन तँ  पिता जीक फरमाइश आ भानस-भात सँ छुट्टी भेटओ।’ माँ से कोनो हालति मे मानै लय तैयार नहिं।
  अर्थात् ओहने बूढ़ माय अपन मातृत्व ममता में,सन्तान सेवाक सुख पबै लय पिता जकाँ स्वतंत्र नहिं भ’ पबैत छथि।
   माय-बाप मे ई अन्तर कोना ने मानबै ?
तुलना नहिं किन्तु अपन होएबा मे-मायक श्रेष्ठता !            
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नोट:
एखनहि प्रियवर मित्र समाधान प्रसाद जीक ई आत्मवर्णन व्हाट्सएप पर प्राप्त भेलय !
      दिन तँ आजुक बनि गेल हमर।
                     गंगेश गुंजन                                      #उचितवक्ताडेस्क।

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