📕। आशीर्वाद !
आशीर्वाद कें बेसी लोक जेठ सँ भेटल अधिकार पूर्ण सनेस बुझैत छथि।
हमरा देखल अछि कय गोटय प्रणाम स्वीकार नहिं करैत रहथि। कतहु सँ आबी आ सब जेठे जकाँ जे कि हुनको गोर लाग’ लगिअनि तँ पयर छीप लेथि। कि तंँ अहाँक शुभ करबाक सामर्थ्य हमरा नहिं अछि। साधारण मनुष्य छी हम।अहांँक ई दायित्व कोना ल’ सकैत छी?’
एकरे दोसर पीठ अनुभव ई बूझक चाही जे किनको आशीर्वाद ल’ क’ अहाँ हुनका आ समाजक प्रति उत्तरदायित्व सेहो ग्रहण करैत छी।तहिया ई ध्यान राखब ओइ व्यक्तिक जीवनक बड़का सामाजिक आत्मानुशासन भ’ जाइत रहैक। प्रत्यक्ष-परोक्षरूप मे सदैव सामाजिकता केन्द्र मे रहैत छलैक। साफ़ साफ़ स्मरण अछि ओत’ महराजी,सरकारी,बाहरी सब टा कानून अप्रासंगिक भ' जाइत छलैए।
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गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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