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कठोर रहैत छैक सुखक खोंइचा !
सुखक खोंइचा थिक - दुःख !
दुःखेक मोटगर खोंइचाक भीतर रहैत अछि सुख। सैह खोंइचा छोड़बै मे भरि जीवन लागल रहैए मनुक्ख।
एतेक दिन सँ हमहूँ लागल छी।
छोड़ाओल भइए नहिं रहलय।
°°
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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