🛖🛖
। मातृभाषाक मण्डप ।
किछु मातृभाषा प्रेमी कें उत्कट भ्रम छनि जे कवि लेखक गण जँ अपन रचना मे छुच्छे ठेठ मैथिली शब्द सब कें चुट्टा संँ बीछि-बीछि क’ आनथि आ प्रयोग करैत रहथि तँ अपन ई महान मैथिली भाषा बाँचि जाएत।
औ ओहन गोटय महराज !
एक तँ कोनहुँ भाषाक रक्षा मात्र लेखके-कवि टा नहिं करैत छैक अपितु ओ भाषा-भाषी लोक, समाज आ सचढ़ सामाजिक कार्यकर्ता पर सेहो निर्भर छैक। राजनीतिक द’ नहिं कहि सकब। एखन धरि से हम अपने नहिं बुझि सकलिऐक ।
हँ भाषाक प्राण मे एक टा इहो सम्पदा रक्षा महत्वपूर्ण छैक किन्तु बहुत रास अन्यहुंँ कारक तत्त्व सब रहैत छैक जाहि सामर्थ्य पर कोनो भाषा जीवित रहैत छैक। से सब टा छार-भार कविये लेखकक कपार ? वाह रे निसाफ़ !
आ अंततः,
कोनहुंँ भाषाक रहब-जाएब मनुष्यक सिमरिया घाट स्नान- प्रस्थान नहिं थिकै जे मोटरी बन्हलौं विदा भ’ गेलहुंँ।बस कि रेल पर बैसि क’ पहुँचि गेलौं। भाषा विशेष प्रकारक,फराक स्तरक,विज्ञानक विषय छैक। अनिवार्य रूपें भाषा वैज्ञानिके सँ परामर्श लेब’ पड़त।
अन्ये भाषा जकाँ बड़ सौभाग्य जे अपन मैथिली सेहो एहेन अनेक भाषाविज्ञानी विद्वान सँ समृद्ध अछि। मुदा एक टा ध्यान अवश्य राखल जाय जे प्रोफेसर भेनहिं क्यो भाषा वैज्ञानिक नहिं भ’ जाइ छथि। जे प्रोफेसरो भाषा विज्ञानेक होइथ सैह टा अधिकारी। ई एक टा भयावह रूढ़ि अछि अपना लोकनि मे। जखन कि यथार्थ तँ ई जे सब टा प्रोफेसर विद्वानो होइथ से कोनो ज़रूरी नहिं।
तेँ एक रती भाषा विज्ञानी पंडित लोकनिक राय विचार लै जाउ। ओना तँ छुच्छ भावुक टिप्पणी सँ बड़ दिव फेसबुक भरैत रहत। कोनो कविता कि बीहनि कथा कि तथाकथित कोनो संस्मरण लिखै जकाँ।
!🙏!
हम तं निवेदने टा क’ सकैत छी।
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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