ग़ज़लसन : एहनो दुनिया कवि कें आख़िर रह' पड़तै ....

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  एहनो दुनिया कवि के आखिर रह' पड़तै
नीक बनयबा लय सदिछन किछु कह'पड़तै।

  स्वप्न अगर रखने अछि मन मे तेहन पैघ तँ
  सकल चोट राज पाटक से सह' पड़तै।

  सुसके नहिं हो नव संसार समाजक रचना 
  जर्जर पुरना लोक महल के ढह' पड़तै।

 बड़ बिषाह बहि रहल बसातक राजनीति कें
  नवका चानन वन मे बदल'-बह' पड़तै।

फगुआ आबि गेल अगिजा के ज्वाला मे
टूटल कोड़ो-काठ सबहि के डह' पड़तै।

  यावत हो संसार अपन सुन्दर रहबा योग  
कवि-कबीर के निशि-दिन जागल रह' पड़तै।
                       ६.३.'२२.
                                        #उवडे.

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