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प्रथम भेंटक
अहंँक ओ
लज्जा प्रकम्पित
प्राण !
नहिं बनल से देह,
कहियो फेर,
दोसर बेर !
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[कवि पूर्णेन्दुक कविताक सम्मान मे]
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क.
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