बाड़ीक पटुआ

📕                         बाड़ीक पटुआ !
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काल्हि प्रोफेसर कवि अशोक मेहताजीक जन्म दिन रहनि। उचिते पूरा मैथिली साहित्य-जगत हुनका स्नेहमय बधाइ आ शुभकामना सँ लदलकनिहें।  
   तँ जेना आचार्य सुमने जी काल संँ रेवाज आबि रहल छै नित्य संन्ध्याकाल प्रोफेसरक किछु अति निकट मित्र ओ छात्रक बैसकी जमैत छैक। सामयिक गोलैसी,विश्व विद्यालय, विभागीय मैथिली भाषा,मिथिला राज्य,ज्वलंत विषय मैथिलीक नऽव मानकीकरण समेत राजनेता-नेतादिक निन्दा पर समाप्त भ’ जाइत आलोचनाक प्रबुद्धजन बैसकी होइत आबि रहल छैक ताही परम्परा मे मेहता जीक निवास जगमग जीवन्त छलय। पर्याप्त पँचमेर मधुर ! चाऽह पाऽन!जन्मदिने रहनि प्रोफेसर साहेबक
  । कि बीचहि मे एक टा सहकर्मी कनिष्ठ प्रोफेसर (नाम वक्तव्य नहिं कारण से गुप्त रखबाक हमरा ऊपर दबाव अछि)बहुत गाढ़ अपनैती संँ पुछलथिन-
‘स'र अहांँक मन ओतेक हर्षित उल्लसित नहिं लगैए-हूस लगैए! से किएक सर ?’
‘नै-नै, हूस किएक रहत! अहाँकें भ्रम भ’ रहलय। प्रसन्ने तं छी।’ प्रोफ़ेसर मेहता कहलथिन।किन्तु अनुज प्रो.साहेबक मन नै मानलकनि।
    तावते एक टा शोधार्थी छात्र ल’ग आबि क’ आजुक बड़ुआ अर्थात् मेहता जी कें जेना अनचोखे चुट्टी काटि लेलकनि-
‘मान्यवर,कहबाक तंँ नै चाही मुदा एक टा बात हमरा बड़ खटकलय सर !’
‘कोन बात ?’ प्रो.मेहता पुछलथिन।
‘भरि संसार कवि-लेखक आलोचकक जन्मदिन के प्रो.भीम बाबू महाकवि मधुपजी सन बुझाइत छन्दोबद्ध कविता मे विस्तार सँ फेसबुक पर विधिवत बधाइ दैत छथिन,अपने पर लिखबाक भावना नहिं भेलनि? मां मैथिली कें अपनेक अवदान किनका सँ कम अछि ? अपने पर किएक नै लिखलनिहें ?’
‘से हम कोना कहब? जा क’ भीमे बाबू सँ पुछिअनु ग’ !’
छात्रक एहि जिज्ञासा पर प्रो.मेहता जीक चेहरा हूस रहबाक रंग आब नुकाएल नहिं रहि सकलनि। डिक्लिअर भ’ गेलनि। लगभग डँटबेक लग पासक भाव सँ खौंझाइत ई जे कहलथिन तं बेचारा विद्यार्थीक मन हूस भ’ गेलै।मुदा तखनहिं दोसर अनुज प्रो. कहलखिन-
 ‘मुदा माफ करबै सर। विद्यार्थीक पूछब एकदम जायज़ छनि। ई बात हमरो बहुत अखरलय। ई तं सरासर अपना बाड़ीक पटुआ तीत भेल। बड़ पैघ भने रहथु परञ्च ऐ विषय भीम बाबू दुतीभाव तंँ बहुत करैत छथिन।’
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   आब ऐ घटना पर दू तरहक समाचार प्रसारित भ’ रहल अछि।किछु सुधी जनक कहनाम छनि जे संगी प्रोफेसरक सहानुभूति सँ प्रो.अशोक मेहताजी कननमुँहें टा भेलथिन। परन्तु किछु गोटेक क’हब छनि '-नै प्रो साहेब सद्य: नोरा गेल छलाह।अन्यथा ताही घड़ी बिनु किछु कहनहिं आंँगन किएक ससरि गेलाह?अवस्से बाथरूम मे जा क’ आँखि धोने हेताह।’
    रच्छ जे मिथिलाक राजधानी दरभंगा रहितहुँ,अद्यपर्यन्त एत’ कोनो तेसरो ख़बरि नहि प्रचारित भेलय।
   दोसर दृश्य आर कारुणिक अछि।
   एहि पंक्तिभेदी अपन व्यवहारक आरोप  दुआरे आब, लगातार अबैत टेलीफोन उठबैत- उठबैत भीम बाबू तबाह छथि।आखिर में दया आबि गेलनिहें तँ स्वामीक सहायतार्थ आब श्रीमती प्रो०भीमनाथ बाबू कें सम्हार’ पड़लनिहें। 
भीम बाबू बड़ आर्त्त भ’क’ श्रीमतीजी ल’ग बजला हय ‘हे लगैए जे आइ फेर भाङ्ग पीब’ पड़त। एक रती पीसिये लीतहुँ तंँ नीक रहैत। तावत हम अन्ठा क’ दस मिनट ओछाओन पर पड़ैत छी।’ ओ मुँह झाँपि क’ पड़ल छथि।
   कि तावते फेर फ़ोन बजलनि।देखैत देरी श्रीमती कहलथिन- ‘ई दिल्ली सँ गुंजनजीक फ़ोन अछि !’
‘एखन कोय जी रहथु। हम निसभेर सूतल छी।’ अपन जीह कूचैत श्रीमती प्रोफ़ेसर कहैत रहलथिन जे फ़ोन पर छथि मुदा भीमनाथ जी लय धन सन।भीम बाबू निर्धोख कहलखिन आ से पूरा वार्तालाप नोएडा मे गंगेश गुंजन अपने काने अस्टक पस्ट सुनलखिन। 
   आब सुनैत छी भीम बाबू सन् प्राचीन जे आब कय बर्ख सँ भाङ्ग पर्यन्त त्यागने छथि तेहन आप्त आ निविष्ट मित्र द्वारा अपन एहन तिरस्कार एहन अमैत्रीय व्यवहार सँ मर्माहत नोएडा मे गुंजन जीक मुँह फूलि क’ तुम्मा भेल छनि।    
  एतबे नहिं,एकरो पर्याप्त सम्भावना देखा रहलय जे मैथिली साहित्यक एहि दुर्घटनाक परिसर मे आगाँ एखन अओर जोड़ - घटाव हुअय…।                        🌻 
                              गंगेश गुंजन 
                          #उचितवक्ताडेस्क।

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