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दु:ख : बहुत दामी गहना !
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अनदिना तँ दु:ख केँ गहने जकाँ संदूक मे राखि लेबाक चाही।ओकराजन्मदिन, पावनि-तिहार,बियाह-दुरागमन मे संदूक सँ निकाली तँ शोकक और्दा मर्यादा मे रहैत छैक आ सहनीय होइत रहैत छैक। सन्तान-शोक तँ ख़ास क’!
महाशोक मनुष्य केँ भरि जीवन आयु पर्यंत मुक्ति तँ दैत नहिं छैक। माय-बाप केँ तँ आरो नहिं। सन्तान-शोकक बाद भला कोन माय-बाप केँ जीयैक इच्छा रहैत हेतैक? किन्तु आयु तंँ अपन पोसुआ सूगा नहिं कोनो। तेँ,
सबदिना जीवन मे दु:ख केँ बहुमूल्य गहने जकाँ नुका क’ राखी ताही मे चैन ! 🍂
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडे.
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