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बसात-बसातिनक स्केटिंग ! 🌀
श्वेताभ जल प्रवाह पर बेटी-बेटा समेत स्केटिंग करैत स्वच्छंद बसात-बसातिन कें देखैत निर्धन संँ निर्धन,असकर सँ असकर जाड़क दुपहरिया,असहाय संँ असहाय गर्मीक साँझ
हृदय सँ देखैत बीति जाइत रहय…मायक कोरा मे बैसल।
से नदी,जल रौद आ बसात अलबत्त,
खास छलय। बेसी काल पूबा पछिमाहा समाचार ठोढ़ सटा क’ कान में कहैत एकदम ल’ग द’ क’ सन सन बहैत चलि जाइ छलय।
ऐ दू हजार पचीस ईस्वी मे हम
कथी वास्ते विकल होइत रहैत छी एते-एते काल।अवश्य जे
से दुःख कोनो कविक माटि पर गिलास खसि पड़बाक नहिं,भरलो गिलास ज’ल खसि पड़बाक रहैत छैक।
चानि पर सूर्य आ कंठक त्रास-काल रहैत छैक।
कय काल कवि,
गंगा-यमुना सन नदीक नदी सेहो बिसरि जा सकैए-मुदा,भूमि पर खसि पड़ल ओ भरि पितरिया गिलास
इनारक ज’ल कें नहिं किन्तु हम,
कथी वास्ते विकल भेल छी एखन ई भोरहरिया मे?
हमर निन्न एना किएक टूटल अछि
बहुते दिन संँ राति नहिं बीति रहलय तकर विकलता तँ ने ?
की भ’ सकैए,कोन बात ...
जानि नहिं बाहर कोन विवाद पर कथी विमर्शक आसमर्द उठल अछि।
भरि समाज विचार-विचारक झाँव-झाँव किएक भेल अछि एना?
महसमर सन लगैत ऐ भीड़-काल मे कोय मनुष्य तोतरा नै रहलय तथापि,
शब्द स्पष्ट किएक ने सुनाइ पड़ै छैक तहिना नै भाषा आ ककरो विचार ?
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.
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