|🛖| पाहुन |🛖|
किछु शहरी संयुक्त परिवार एखनहुँ चलि रहल अछि जे बहुत ख़ुशीक बात। एक टा एहने चरिपीढ़िया संयुक्त मैथिल आश्रमक परिदृश्य।
एक टा बाबा जे बूढ़ झुरकुट अवश्य किन्तु एखनो बहुत चेस्टगर-होशगर रहथि।सब हुनक सेवा मे प्रस्तुते बुझायत। तथापि बुढ़ा तंँ बुढ़हे ! हुनकर कोनो फरमाइश पूर होइ मे देरी भेलनि आ कि कोई बिसरि गेलनि अथवा तेसर वा चारिम पीढ़ीक कोनो बेटा पोता-पोती कनी टोकि देलकनि जे ‘बाबा अहाँ केँ सब किछ तुरन्त चाही…आनिए तँ रहल छलौहें।’ इत्यादि तँ बाबा बड़ करुणा संँ कहथिन-
‘हे,हमरा एना जुनि ललकै जाउ। हम तंं पाहुन भेलौं।आब कतेक दिन रहब?’
स्वाभाविक छैक पुरना लोक सब नवका के डांँटैत छनि। एहनो कोय बजैए ? खबरदार।
एहन घटना अओर कय बेर घटित होइत रहलै आ बुढ़ा कहैत रहलखिन : ‘पाहुन छी। आब हम कते दिन जीयब बौआ ?’
एहना स्थिति मे बुढ़ा पर सबके बड़ करुणा भ’ जाइ।संबंधित लोक केँ खूब गंजन होइ।
एक दिनक कथा कहैत छी। साँझ होइत रहै। बुढ़ा केँ चाह पीबाक इच्छा भेलनि तंँ आने दिन जकाँ जोर संँ चीकरि क’ कहलखिन। जे क्यो सुनने हो से बना देतनि। फरमाइश कऽ कऽ बुढ़ा आशा बाटी ताक' लगला। चाह अबै मे जखन अपना हिसाब सँ बहुत देरी बुझाय लगलनि तंँ जोर सँ तगेदा कयलखिन। कि ताबत, तुरन्ते स्कूल सँ आयलि सबसँ छोटकी पोती ल’ग मे अयलनि आ कनिक तुर्छ भ’ कहलकनि-
‘हँ, दादा जी। माँ सुनलक। हाथ लागल छलै। चाह बना रहलय। अहाँ तेना अगुता देलिऐ जे माँ के हाथो पाकि गेलैए…’ ऐ पर अपरतीव जकाँ होइत बुढ़ा बड़ करुना मे कहलखिन- ‘तामस जुनि करु बौआ। आब हम छीहे कते दिन,पाहुन छी…’
‘दादा जी यौ,पाहुन कतौ एते-एते दिन रहैत छै ?'
पोती भनें बालबोधे मे मुदा ई बात जे कहलकनि से बुढ़ा चुप्प भ’ गेलखिन।
‘छिया-छिया! दादा जी केँ एहनो कोय कहै छैक?’ भनसे सँ माय डंँटैक रूप मे बेटी कें टोकलखिन।स्वाभाविके जे तकर बाद पोती के बहुते फज्झति सुन’ पड़लै।
पहिने सुनलिऐ जे कहाँ दन बुढ़ा ओइ राति जे सुतलखिन से सुतले रहि गेलखिन। कोय कहलक जे नै ‘ओइ राति नहिं बल्कि तकरा चारि-पांँच दिन बाद विदा भ’ गेलखिन।
▪️
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें