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एक टा बड़ विशिष्ट प्रौढ़ कवि अपन कविता टिपैत लिखलखिन जे-
‘…लिखैत काल लगैत रहैए जेना कविता हमर थाकल रहय,
सब शब्द थरथराइत रहय,वाक्य सब सिसुकि-सिसुकि क’ कानैत होअय…’
‘एहना परिस्थिति मे कविता केँ आरामे कर’ दिऔ ने काकाजी।बेचारी कविता केँ कथी लय उकठ करैत छिऐ? मात्सर्य नै होइअय ? संगहि अपनो विश्राम कनी क’ लिअ’। कथी लय जागल छी? कनी काल निन्न भ’ गेने कविते संगे अपनहुंँ देह-चेतना फरहर भ’ जायत।ऊठब तँ फेर लीखि लेब।’
कविक उक्त टिप्पणी उद्गार पर तत्काल एक टा परम जाग्रत युवा चेता फेसबुक पाठक अपन शुभचिंतक तत्पर प्रतिक्रिया दैत जे लिखलकनि तँ एक टा बुढ़ा लेखक तामसे बहीर भ’ गेलखिन। कहलखिन- कहू तँ केहन चांँइं अछि ! एते वरिष्ठ कवि लेल एहनो कहीँ लिखबाक चाही ? सत्ते आब फेसबुक पर अतत्तह भ’ रहलय !’
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ई वृत्तान्त हमरा एखने फोन पर सुनाओल गेलय।
‘सुनौनिहार के ?’
‘…आर के? एहन अलगटेंट आर के अछि संसार में? वैह हमरे समाधान प्रसाद जी।
‘ई अहांँ एकदम अनुचित कयलौं। एना नहिं लिखबाक चाही।’ हम अपन असंतोष आपत्ति कहलिअनि तँ आश्चर्य मे पड़ि गेलौं।कारण ओ अपन स्वभावक विरुद्ध तुरन्त बात मानि लेलनि आ खेदो प्रगट करतै कह’ लगलाह जे
‘अहाँ लोकनि तँ कवि-लेखक छी।सब दिने मनमाफिक काजमे व्यस्त रहैत छी।आनन्द अछि।परन्तु हम तंँ छुच्छ पाठक।हमरो सन लोकक मनक व्यथा बुझू। हमरा लगैए जेना क्यो मने-मन फगुआ खेला रहल हो बल्कि कही जे फगुआ-रमकी में हो आ ताही मध्य एहने कोनो सुखाएल चेरा सन वस्तु पढ़ना जाइ तंँ कोन उपाय? किछु तेहने मन: स्थिति मे एना कहना गेल।
'किन्तु आब हमरा की करबाक चाही कवि जी ?’
समाधान जीक एहि प्रश्न पर हम तँ निरुत्तर। किछु जवाब नै फुराएल…। पाठकक एहन कोटिक समस्याक अहाँ लोकनि किनको नजरि मे समाधान अछि की? हो तँ अबस्से कही।
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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