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दकचल कागद !
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ग’हे ग’ह दकचल अछि-
अनन्त वाङ्मय सँ,अन्तहीन विस्तृत
अतीत कालक कैनवास।
ऐ पर कत’, कोन आखर,रंग, भाषा वा
केहन कलम सँ की किछु लिखि-रचि
सकबै कवि,
कहि सकबै जकरा-
‘खाऽस,अप्पन आ प्रथम बे'र ?’
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क।
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