साहित्यक छात्र आ मैथिली निबन्ध-लेखन !
सुनलौंहें,कोय कहैत रहय जे मैथिली कक्षाक सप्तम कक्षाक एकटा सावधिक परीक्षा मे कोनो प्रशस्त लेखक तथा शिक्षक क्वेश्चन सेट कयलखिन जकर ‘उत्तर अनिवार्य अछि’ कोटिक मे रहैक :
प्रश्न . 'आजुक समयक साहित्य मे खुशामद / ठकुर सोहैती पर एक टा गवेषणात्मक दीर्घ निबन्ध लीखू। (अंक -५०.)
उचिते किछु विद्यार्थी एहन विषय पर आपत्ति कयलकै।आवाज उठौलक जे - ई सिलेबस संँ बाहर विषय अछि आ सेहो अनिवार्य !
परीक्षा हॉल मे गल-गुल मचलै तंँ आखिर हेडमास्टर साहेब कें आब' पड़लनि। विषय कें बुझैत हुनको ऐ प्रश्नक खास औचित्य नहिं लगलनि। तखन संबंधित लेखक-शिक्षक केँ पुछलखिन। प्रश्नक औचित्य पर उक्त लेखक शिक्षक जवाब देलखिन -
'देखल जाव सर,अपना स्कूल मे कय टा छात्र -छात्रा साहित्य रुचिक बहुत मेधावी सब पढ़ि रहल छथि।कदाचित आगाँ साहित्ये कें अपन आजीविका बनाब’ चाहथि।कारण जे अगिला किछु वर्ष मे साहित्य रोजगारक क्षेत्र भ' रहल छैक सर। आ जखने रोजगार हेतैक तखने स्पर्धा हेतै। स्पर्धा हेतैक तंँ परस्पर आगांँ बढ़बा मे कतोक बाधा औतैक।ई ‘ख़ुशामद कला’ आ ‘ठकुर सोहैती’ तंँ अजमायल कौशल छैक,सब संँ अचूक कला थीक। मैथिली साहित्य जें कि रोजगारक नव क्षेत्र बनि क’ उभरि रहल छैक तें ऐ मे उपर्युक्त दुनू कला (ख़ुशामद कला आ ठकुर सोहैती)क अओर बड्ड बेसी डिमाण्ड रहतै। तकर यदि पहिनहि सँ प्रशिक्षित पटु विद्यार्थीक चांँस बहुत बेसी बढ़ि जयतैक। स्पर्धा मे आगाँ निकलबाक धारदार गुण रहतै तंँ।'
सुनलौं तंँ इहो जे हेडमास्टर साहेब कप्पार पर पानिक पट्टी पर पट्टी बदलि रहल छथि.कैजुअल लीवक उपभोग क' रहल छथि... 📕
गंगेश गुंजन #उचितवक्ताडेस्क।
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