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सूत्रधार : रंगमंचक सब सँ छोट स्वरूप
परिवार होइत अछि। सिद्धांत।
मंच : भोजन काल। दिन।
पात्र : एक प्रौढ़ लोक। दोसर
प्रौढ़ा स्त्री।
प्रौढ़ लोक : (आँगुर चटैत,बाटीक करैल
झोर कें विचित्र जकाँ देखैत,
आगाँ बैसलि स्त्री कें पूछैत
छथिन):
:आइ भानस के कयलनिहें ?’
स्त्री : से किए?की बात?'(पुछलथिन)
प्रौढ़ : नै-नै।पहिने कहू ने जे,के ?’
प्रौढ़ा : मधुरमनि बौआसिन,दछिनवा
रि गामवाली।
प्रौढ़ : सुआइत ? करैल कें एतेक
मधूर वैह क' सकैत छथि।’
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[ पुतहुक प्रशंसाक आशा सँ बिहुँसैत बुढ़ी जेना ठामहि झमा क’ खसलीह।ओम्हर,भनसा घर में जेना पक्का पर कोनो रिकबी खसि पड़ल हो जे झन्न् न् गोंगिआइत ध्वनि करैत नाचि रहल हो..तकरे ध्वनि-संगीत वातावरण मे पसरि जाइत अछि ] इति,
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क प्रस्तुति.
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