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विश्वासक धरती - आकाश !
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रहय पृथ्वी ऐ पर लोक नहिं हएत
एकर से दिन तँ कहियो नहिं अएत
मा'टि,जल,पवन,नभ,रौदक सृष्टि
सूर्य-स्नेहीक अछैत तँ नहिं हएत !
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गंगेश गुंजन
#उचतवक्ताडेस्क.
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