| कवि कतहु याचना करय…
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धरती संँ मंँगलिऐ तँ एक आँजुर धूरा आ दुनू पयर मे यात्रा भरि देलक
आकाश सँ मंगला पर ओ हमरा अनन्त स्वप्नक कल्पना-क्षितिज मे साटि देलक
सरकार कें याचना कयलिऐ तँ एक टा ओझराएल अनिश्चित महकमाक कोनो अनुमोदित फाइल सुन्झा देलक
आब बाँचल सर्वोच्च !
ओत’ माँग’ गेलहुँ तँ प्रतापी राजा जकाँ देश निकालाक कुपित असंतुष्ट आदेश भेटलय…
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हमरा कान्ह पर रुग्ण बूढ़ पिता छथि
हिनका कत’ रखबनि ?
कोन ठाम ?
गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.
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