⛺ म'न खराप मे असकर !
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धीपल तऽब भे'ल
ज्वर सँ हाड़-पांँजर तोड़ैत देह-दर्द मे
असकर किएक रहओ कोनो ज’नो-बोनिहार ?
विकालहु मे किएक जाय पड़ै ओकर स्त्रीओ कें काज
करय घ’रे-घ’र ?
स्त्री किएक ने रहि सकय ओइ दिन घरे मे
अपना व’रे लग !
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडे.
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