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" दिल्लीक दिल मे मैथिली चौपाड़ि"
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कवि आइओ साधके होइत छथि साधना करैत छथि, बतौर कठोर तपस्ये करैत छथि तखन जा क' कवि होइत छथि।
कनी एहि बातक कल्पना कयल जाव जे आइ एहन कड़गर जाड़, शीतलहरि मे पर्यन्त भरि दिल्लीसंँ कवयित्री -कवि गण मात्र कविता पढ़ै लय एक ठाम कतहु एकट्ठा होइ जाइ छथि।आन कोनो टा स्वार्थ नहिं,मात्र अपन कविता पाठक आतुरता मे!
कविताक प्रति ऐ सँ पैघ मैथिली तपस्या की हेतै ?
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गंगेश गुंजन
#उचितवक्ताडेस्क.
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