गाम
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बैसल-बैसल गाम गुनै छी
बैसल-बैसल गाम घुमै छी।
ऐ बर्खा बुन्नीक मौसिम मे
कदबा खेतक धान बुनै छी।
बरिसलए ऐ बेर झमटगर
तै मेंघक बड़ गून गबै छी।
आन बर्ख सन ऐ बेर नै ओ
झूठ कहत जे फेर अबै छी।
दु:ख बहुत जे गाम छोड़ि क’
कैे गो चलि गेल फेर सुनै छी।
बांचल खूचल स्वप्न जोगा क’
अपन कोन हम गाम धरैै छी।
शहर रहै छी शहर भोगै छी
हृदयेक रथ पर गाम बुलै छी।
अंङ्गना कातक ओल भेल हैत
गामक स्वादक झोर चिखै छी।
एखने सं धानक उपजा लय
बैसल गामे मन बंटै छी
एखने सं अगहन पूछैये
बौआ, कहिया गाम अबै छी ?
'रूसलि कमला मोहार बाधक
परती खेतक गाम रहैत छी।'
बैसल-बैसल गाम लिखै छी
बैसल-बैसल गाम पढ़ै छी ।
क्यो तं हमरा सोर क’ रहल
शब्द-शब्द किए गाम सुनै छी ।
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गंगेश गुंजन । २ जुलाई,२०१७ ई। पारस टियरा।
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