नव निकषक अन्वेषण : मैथिली लेखनक परिदृश्य

प्रिय रमण,
बहुत प्रासंगिक विमर्शक अहाँक एहि टिप्पणीक की भवितव्य अछि से तं नै कहि सकब मुदा व्यक्तिगत हम एकरा महत्वपूर्ण आ फौरी प्रयोजनक रूप मे मानलौं।आशा सकारात्मक आ नीके बुझाइए।
अंतिम चिन्ता जाहि 'आलोचकीय नैतिक विवेक' सं बूझल मानल जा सकैए तेहन एकहु टा 'लेखक-कवि कलम' आ 'आलोचक कलम कवि' वर्तमान मैथिली कें सौभाग्य मे छथि ?
'अपवाद' स्वरूप अवश्ये हेताह/हेतीह। मुदा एहन जटिल जिम्मेदार भूमिका अपवाद सं नहि चलैत छैक।
नग्न वास्तविकता तं ई अछि जे रचनाधर्मी ओ आलोचनधर्मी सभक अपन अपन शेड्यूल परिधि,लोक आ तदनुरूप एजेण्डा छनि।जे कोनो विद्रोही नव स्वरताक आभास दैत विचार अबैत अछि, प्रायः पूर्वग्रह प्रदूषिते।
कोनो रचनाक श्रेष्ठताक निकष वा मानदण्ड की ? तकर निर्णायक-निर्धारक अर्थात् सिद्धांतकार के ?आ अंतत: प्रयोक्ता के ?अपन गत कतोक दशकक हिन्दी-मैथिली लेखनक अनुभव-वैभवक इजोत मे कहि‌ रहल छी। आंखिन देखी। तथापि कोनो निराशा में वा निराश करैक भाव‌ सं नै कहि रहल छी।
ई हमर चिंता अछि,कोनो तरहे अहाँक विचारकप्रतिवाद नहि।
अहाँक एक टा बिन्दु पर अपन मन हम दोसर टिप्पणी मे कहि सकब से आशा। ...आब बेसी काल लिखबाक धैर्यो कहां रहैये 😄
-गंगेश गुंजन। २९ जनवरी,२०१८ ई.

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