एक बेर फेर मित्रलाभ निवेदन-सुझाव !
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आलोचना सहन करबाक शक्ति आ धैर्य नहि हो तं कोनो रचनात्मक कार्य (विशेष क' साहित्य-लेखन) सं फराके रहबाक चाही। एत' धरि जे कोनो सामाजिक कार्य करबा काल सेहो, यदि आलोचना सहबाक सामर्थ्य नहि हो।
आलोचक कें सेहो 'आलोचना'क आवश्यक 'विवेक' रहबाक चाही। से विवेक यदि एक रेखीय वा एकायामी, अर्थात 'पूर्वग्रह' सं युक्त रहैत अछि तं कए बेर उचितो आलोचकीय निष्कर्ष आ कथन संदेहक घेरा मे पड़ि क' अविश्वसनीय आ अमान्य भ' जाइत छैक।
आलोचना सेहो एक टा प्रबल नैतिक कर्म होइछ।ध्यान रहय। आलोचना कोनो मास्साहेब हाथक कर्ची नहि थीक।
विश्व पुस्तक मेला मे सद्य: परिघटित 'मैथिली मचान' पर एहन धमगज्जर अतिवादी प्रतिक्रयाक बिरड़ो-बसात मात्र भ' क' ने रहि जाय।एकर चिन्ता संपूर्ण मिथिलाक बनब' पड़त। से हमरा सभक तत्काल कर्त्तव्य !
आयोजक आ आलोचक चैन सं संवाद, विचार विमर्श करी से हमर आग्रह विनती !
-गंगेश गुंजन
१९.१.'१८.
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