वाह रे वाह ! मैथिली- मिथिलांचलक नाम पर खखरी धमगज्जर

सुनैत छी,अमरीका आ चीन समेत भरि विश्व कतोक छोट-पैघ देश कें भारत मे "पैघ बजार" देखाइत छैक।आ अपन-अपन निवेशक टिकाउ ओरिआओन।
तहिना अपन भारत मे,देशक भीतर 'मैथिली-निवेश'क घनघोर स्पर्धा चलि रहलय।मैथिलीक क्षेत्र बहुत उर्वर-उत्पादनक संभावना वला खेत छैक। तें कार्पोरेटी उत्साह-उछाहक ई अभियान एखन एहिना चलत।
हम बतौर एकटा मैथिली लेखक चिंतित तं छी,निराश नहि।जनिका "मैथिली मोह" मे साकांक्ष‌ रहबाक अवकाश आ भावना अछि से अवश्ये हमरो आदरणीय छी।
हम तं व्यवहारत: १९६२ ई.सं मैथिली सेवी-सेनानी-अभियानीक एकहि संगे आदर्श आ अपैत सेवकक कारोबार देखैत आबि रहल छी। रूप ओ मात्रा भेद सं एक रंगाहे अछि।दूनू समय आ भाषा प्रेमक व्यवहार मे
कोनो तात्विक भेद नहिं बुझाइत अछि।नव-पुरान खाढ़ीक द्वन्द्व ओ द्वेष तहियो रहैक। मठाधीशीक परिदृश्य सेहो।
     हमर ई सब कहब जनिका अप्रिय हो से क्षमा क' दी, निवेदन हमर।

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