कनियाँ उतारब

कनियाँ ‌उतारब
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महानगरमे एक टा छोट बहिन जेठ बहिन के फोन पर आग्रह कयलखिन-
-कनियां अहीं के उतारबाक अछि बहिन दाय ! मन्नूक
दुरागमनो संगहि क’ रहल छिअनि!’
-'हमर स्वास्थक हाल तो बुझले अछि अहां के…।’ जेठ बहिन अपन लाचारी कह’ लगलथिन तं बीचहि मे छोट बहिन टोकैत कहलथिन-
-'आब से‌ जे,बहिन दाय, मुदा ई हमर मनोरथ अछि जे हमर छोटकी पुतहु अहीं उतारी !’
    फोन स्पीकर पर छलनि। बहिनोइ चिन्ता मे चीत्कार करैत पत्नी के कहलथिन-
- ‘कहू तं अहां बुतें कनियां के कोरा मे उठाओल हयत?अपने देह दुखताह अछि...।’
-’से की ?’ बहिन दाय पतिक प्रश्न नहिं बुझलनि।
-’कहलौं जे एहन सन टिटही देह सं अहां बुते कनियां के उठाओल हयत?’ पति गप के फरिछबैत चिन्ता करैत पुछलथिन।
-’अहूं बेस छी। दुरगमनिया कनिया दू मुठ्ठीक तं नेना रहैत छैक…’ बहिन दाय पति कें बुझौलनि।
-’हे ईश्वर,तखन तं आर खतरा। पुलिसे ने पकड़ि क' जहल मे ध’ दिअय। बाल विवाह कानूनी अपराध होइ छैक। अहां के बूझल नै अछि ?' चिंता सं पति आर चीत्कार क’ उठलथिन।
-'धन्य छी।' पत्नी के हंसी लागि गेलनि। कहलथिन-
-कनिया उतारब दुरागमनक एक टा विधि होइत छैक। इहो ने बूझल अछि।सत्ये,अहूं हरिमोहन बाबूक नैयायिके जी छी। गामो तं तेहने अछि।’
   पति लजा गेलथिन आ से नुकबै लय पुछलखिन-
-धोती-गमछा दितौं। स्नान कऽ लितहुं। नहाय चललाह !
बहिन दाय वर पर बिहुंसली।         
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-गंगेश गुंजन। १ फ़रवरी,२०१८.

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