दोहा

आन्हर के सूझय न जग  कामी कें न  विवेक ।
निसांबाज  देखय न श्रेष्ठ स्वार्थी लय सब एक।।                 *
जीति  लेब  योद्धा  सहस्र से संभव भ’ जाय।
अपन मन के जे जीतय असली वीर कहाय‌ ।।
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-गंगेश गुंजन

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