शब्द आ भाषाक हत्या सेहो होइत छैक,लोके टाक नहि।
कोनो जातीय चरित्र आ आचरण मे सं जखन कोनो शब्द उपेक्षित होअ' लगैत छैक आ व्यवहार सं बाहर क' देल जाइत छैक तं घुरि क' ओ कोश मे शरण ल' लैत छैक।
जाहि समाज मे महराजक मुंह पर उचित बाजि देबाक सहज नैतिक बल रहैत छलैक ताहि 'उचितवक्ता' कें विस्थापित क' बनवास के देलकै?कियेक आ कोना?
ई सोचल जयबाक चाही कि नहि ?
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फेसबुक पर समाज आ ‘उचितवक्ता’ प्रकरण तं,पोखरि मे जुमा क’ फेकल झिटुका मात्र छल हमर। किशोरावस्था में जेना पोखरिक पानि पर पूड़ी बनबै लेल ढेपा जेकां झिटुका फेकी। स्पर्धा रहैक जे ककरा झिटुका सं पोखरिक पानि पर बेसी पूड़ी बनलै’ देखबा वास्ते।
मुदा से देखै छी जे बेस आंदोलित भेल अछि।
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गंगेश गुंजन
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