आलोचना सं मुक्त रहि कऽ
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विचारक सेहो ख़ुशामद कयल जाइत छैक। खुशामद सं विचार सेहो अगधा जाइए,मनुष्ये जेकाँ। सब समाज मे विचारक चाटुकार सेहो होइत छथि।प्राय: तें कालान्तर मे चाटुकारिता,समाजक बीच जीविकोपार्जनक एकटा सरल उद्यम-उपाय सेहो बनि गेलैक। से बेसी राज्याश्रय मे भेलैक। बल्कि धनिक आ संपन्न वर्गक तथाकथित लोक-परिवार मे एकरा प्रश्रय द' क' पोसल जाइत रहलै।
केहनो विचार हो चाहे ओ कतबो प्रशस्त आ स्थापित कियेक ने भ’ गेल हो यदि ओकर आलोचना हएब थमि जाय तं बूझि लेबाक चाही जे ओ 'विचार’ बूढ़ झुरकुट्ट आ जर्जर भ’ गेल।अत: मरणासन्न।
आलोचना सं मुक्त लोक तं सहजहिं मृत।
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-गंगेशगुंजन
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