बाल-दोहाक श्रृंखला मे जे किछु

बाल-दोहाक श्रृंखला मे जे किछु कहि रहल छी से हम अपन भारतीय लोक ज्ञान-परंपरा,अपन परिवार,गांव और गुरु के सान्निध्य में प्राप्त अनुभव-पुस्तक ज्ञान में भेटल बुद्धिक इजोत मे नव दोहाक स्वरूप में कहबाक यत्न क’ रहल छी। हमरा बोध अछि जे हमरा लोकनि जाहि सदी मे आएल छी ताहि मे पूर्वक जे अपन लौकिक ज्ञान-परंपराअछि तकर मूल उत्स पाएब तं सरल नहि परंतु जत्त सं निकलि क’ ई अपना लोक-जीवन में पसरल ताहि सं आइयो हमरा सभ अपन उपयोग आ अपने प्रकाशक गुंजाइश निकालि लैत छी। कखनो अपना कखनो भविष्यक वास्ते। ई काज भाषा और साहित्यक माध्यम सं अधिक प्रभावशाली रूपें  होइत आयलए। ताहू मे कविता माध्यमे बेशी.
     काव्य विधा में संप्रेषण वास्ते दोहा बहुत सटीक, मार्मिक और लोकप्रिय विधा।उपयुक्त।अतः बालबोधक वास्ते त अओर काजक। तें हम ई मैथिली मे कहबाक कोशिश कयल.ई बात नहि जे एहि सं पहिने सेहो लिखल नहि जेल हेतैक.  हम अपन प्रयास केंद्रित कैलोंहें एहन दोहा के निरंतरता देबाक नेत सं। किछु दिन धरि लोकक ध्यान मे अनवरत दोहा, बाल-दोहा आबैत रहय तथा अन्य सभ कुशल कवि,नवतूर कवि हमरा सं अधिक सक्षम कुशलता आ मार्मिकता संग  मैथिली में बाल दोहा लिखथि,प्रकाशित करथि। एकरा हम एक टा प्रस्ताव रूप अपन समाजक समक्ष राखि रहल छी. कहब आवश्यक जे हमर ई दोहा सब एक तरहें प्रथमे प्रारूप अछि।एहि पर काज हैब थोड़े बाकी छैक। यद्यपि हम ई कोनो  हड़बड़ी में,वा कोनो यशक लोभे सेहो नहि. मात्र बाल साहित्यक कालोपयोगी चिंता में जरूर फेसबुक पर देब प्रारंभ क’ देलियैक अछि। ई सब दोहा हमर अनुमौलिक रचना थीक।एहि प्रयास मे अपन त्रुटिक हमरा ज्ञान अछि।से बुझितो कथ्यक रक्षा आ संबोध्य वर्ग मानसक पक्ष मे हम कए ठाम जाय देलियैक।    
     ई कहब सेहो आवश्यक जे आजुक समय मे,प्राचीन कोनहुँ काव्य-विधाक अनुशासन बद्ध संपूर्ण शुद्धताक संगें रचना करब भरिसक्के सहज रहि गेलय। भने असंभव नहि मानी। असंभवप्राय अवश्ये। कविता-विधा में तँ आओर।कारण भाषा,ज्ञान-विज्ञान,समाजक वैश्विक अंतरसंबंध सरल सुलभ अबरजात, बोली-व्यवहार पर समकालीन सभ भाषाक सभ भाषा पर प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभाव समेत प्रति पल जटिल होइत जा रहल मनुष्यक जीवनानुभव।विघटित होइत जाइत वर्तनीक यथार्थ! इत्यादि।आइ पुरना काव्य-निकष पर उत्तीर्ण रचना जे करैत होथि से अभिवन्दनीय मुदा से कविता आब एहिना दुर्लभ होइत जायत।   
हमर एहि सृजनात्मक उद्यम के आब,नवअभिभावक, शिक्षक, साहित्यानुरागी,विद्यार्थी,कवि जाहि रूप में स्वीकारथि। हुनकहि लोकनि पर।बिना कोनो दाबी करैत,थोड़ेक अंतराल धरि हमर भूमिका विश्राम मे। 
-गंगेश गुंजन।०४.०४.’१८

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