पवित्र मुर्गी

चिकेन कथा
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ई खिस्सा एक टा सुसंस्कृत पढ़ल-लिखल प्रतिष्ठित आधुनिक मैथिल परिवारक थिक।ओहि भाग्यशाली परिवार कें परम् मेधावी दू पुत्र रत्न।आ आधुनिक। छोट जन किछु विशेष।ओ मेट्रोपोलिटन नगरक विख्यात विश्व विद्यालय मे पढ़ि-गुनि क’ अगिले वर्ष उत्तीर्ण होइतथि परन्तु पढ़ाइएक क्रम मे हुनका परम सुन्दरि एकटा सहपाठी कन्या सं उत्कट अनुराग भ’ गेलनि। लगले दुनू गोटय मे वियाह करबाक आ सातो जन्म प्रेम निबाहवाक सप्ता सप्ती सेहो भ’ गेलनि। निश्चयो क’ लेलनि।बिना कोनो विलंब कयने विवाह करताह। उछाह उल्लास मे घर आबि क’ सब सं पहिने ई निश्चय माय कें सुनओलनि। सुनितहि मायक करेज डोल’ लगलनि। जे कि स्वाभाविके। अनजाति बियाहक एहनो विकट युग मे,इष्टदेवताक कृपा संग परिवारक प्रतिष्ठा बाँचल अछि तकर एहि परिवार कें बड़ गौरव। एखन धरि कोनो बेटा अनजाति विवाह करबाक दुस्साहस नहिं कयलक। से कुलक नाक ऊंच अछि। मुदा एखनहि बेटा सं ई सुनि क’ माय के दाँती लाग’-लाग’ पर भ’ गेलनि। रच्छ जेँ बाँचि गेलनि। कतबो बुझाओल गेल। बालक नहि मानलखिन। बियाह नहि  रुकलनि। उपाय ?तखन फेर तँ बेटे-पुतहु। दुरागमनों संगहि होइत कनिया बासा पर आयलि। जेना कि होइतहि छैक एकदम्मे सं दू संस्कृति दू व्यवहारक घोलि मालि चललै।मन विरुद्ध होइतहुँ माय-बाप यथासाध्य परिस्थिति अनुकूल करबा में लागि गेलथिन। पुतहु सेहो परिवारक हिसाबे हिनका लोकनि सन होअ’ लागलि। किछु दिन बीतल। की एक दिन अनचोके बेटा कह’ लगलथिन।
-माँ तोरा आ पप्पा लय आइ तोहर पुतहुवे भानस करतौ।’ बेटा बड़ स्नेह सं माय कें कहलनि।
-कथी लय?कोन काज? नवकनियाँ सं काज कराएब तँ लोक निंदा करत।अपन गृहस्थी सम्हारती तंकरतीह।’ माय मना कयलथिन।
-नै माँ कते दिन सं कहि रहलय जे माँ-पप्पा को मैं अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाना चाहती हूँ।’ कहैत,बेटा तैयो जोर देलथिन। माय फेर मना करितथिन ताहि सं पहिने दोसर कोठली सं पप्पा कहलखिन -
’आब कनियाँ कें भावना भेलनिहें,भानस करबाक आ  इच्छा छनि तँ किएक रोकै छियनि? बनाब’ दिअनु।’
बेटा हँसैत,आह्लादित होइत जल्दी सं चलि गेलथिन।
      दोसर दृश्य रात्रि भोजन कालक।
बर-कनियाँ मिलि क’ उत्साह सँ टेबुल पर प्लेट-कटोरी-चम्मच-गिलास आदि सजओलनि।आदर आ ख़ुशी सं माँ-पप्पा कें बजओलनि। मोन लगा क’ प्लेट इत्यादि में भोजन-विन्यास परसल गेल।पप्पा ॐनमोनारायण कयलनि। पंचग्रास लैत भोजन प्रारंभ भेल। माँ सेहो क’र उठौलनि आ मुँह में देलनि।पुतहु अत्यंत स्वादिष्ट भोजन बनौने रहथिन। बड़ ख़ुशी भेलीह। विन्यासो नाना प्रकार। कए टा न’व सेहो बुझयलनि। खाय लगलीह। एहि बेर जे मुँह मे क’र देलनि से स्वाद तँ बेस नीक मुदा एकदम्मे अनचिन्हार।बड़ जोर चौंकली।
‘ई कथिक तीमन थिकै कनियाँ ?’हबो ढकार भेल पुछलथिन।
-किए नीक लगलनि माँ ? आरो दिय’ ?’ उल्लसित होइत कनियाँ कहलथिन।
-थिकै की ?’ माँ किछु उद्विग्न होइत,किंचित तमसाइत पुछलथिन।
-चिकेन छै माँ। किएक? एकदम नब स्टाइल मे... ‘
-माने मुर्गी यै ? राम-राम ! सत्यानाश क’ देलौं। कहू तँ ई निषिद्ध बस्तु खाइत छी हम? ओअय... ‘    
- मुदा चिकेन कें गंगाजल मे धो क’ रन्हलियैए माँ।’  अप्रतिभ भेल कनियाँ कहुना क’ कहलथिन आ डरायलि बैसलि। सोचलनि जे माछ-मांस तँ खाइते छथिन।तहू पर हम गंगाजल सं धो क’ रन्हलियै। तखन ई की भ’ गेलै ? पुतहु दुखी भेल।बेटा सेहो स्तब्ध आ उदास भेल हाथ बारि लेलथिन। आ कि बीचहि मे पप्पा कहलथिन।
-’बड़ सुंदर बनौलोंहें कनियाँ ! वाह ! लाउ एक दू बुट्टी आर।’
बिहुंसैत पप्पा, स्वादि-स्वादि क’ खएने जा रहल छलथिन।              
-गंगेश गुंजन.

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